गढ़वा मूलनिवासी संघ जिला इकाई गढ़वा के तत्वावधान में राष्ट्रनिर्माता बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर एवं राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले की संयुक्त जयंती समारोह का आयोजन बंधन मैरिज हॉल, गढ़वा में किया गया। इस अवसर पर जिले के अनेक मूलनिवासी लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
कार्यक्रम में झारोटेफ जिला इकाई गढ़वा के जिलाध्यक्ष श्री सुशील कुमार भी उपस्थित थे। उन्होंने “लोकतांत्रिक भारत: हमारा कर्तव्य, हमारी जिम्मेदारी” विषय पर अपना सारगर्भित व्याख्यान प्रस्तुत किया।
जिलाध्यक्ष सुशील कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि लोकतंत्र केवल एक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक जीवनशैली है। यह नागरिकों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजिक समरसता और न्याय का वादा करता है, लेकिन इसके साथ ही नागरिकों से सजगता, जागरूकता और जिम्मेदारी की भी अपेक्षा रखता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि भारत भले ही विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, पर क्या हम इसके सबसे जिम्मेदार नागरिक हैं? क्या हमने लोकतंत्र को केवल वोट देने तक सीमित कर दिया है, या इसके मूल्यों और कर्तव्यों को भी समझने का प्रयास किया है?
उन्होंने बताया कि भारतीय संविधान ने हमें अनेक मौलिक अधिकार दिए हैं जैसे: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता, और जीवन एवं स्वतंत्रता का अधिकार। लेकिन 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा 11 मौलिक कर्तव्यों को भी जोड़ा गया। इनमें संविधान का सम्मान, राष्ट्र की अखंडता की रक्षा, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना प्रमुख हैं।
उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि आज अधिकांश नागरिक अपने अधिकारों को लेकर सजग हैं, लेकिन कर्तव्यों के प्रति उदासीन हैं।
जिलाध्यक्ष ने कहा कि एक स्वस्थ लोकतंत्र तभी संभव है जब उसके नागरिक सक्रिय, जागरूक और नैतिक हों। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि चुनावों के बीच की जिम्मेदारियों से भी संचालित होता है। इसकी नींव न्याय और समानता पर टिकी होती है, लेकिन आज भी समाज में जाति, धर्म, वर्ग और भाषा के आधार पर भेदभाव व्याप्त है।
उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में असली ताकत जनता के हाथों में होती है, लेकिन जब जनता अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों के प्रति लापरवाह हो जाती है, तो सत्ता बेलगाम हो जाती है।
महात्मा गांधी, बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर और जयप्रकाश नारायण जैसे महान नेताओं ने लोकतंत्र को सिर्फ एक राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि एक नैतिक व्यवहार के रूप में देखा। उन्होंने सिखाया कि लोकतंत्र का सार आत्म-नियंत्रण, परस्पर सम्मान और नागरिक सहभागिता में निहित है।
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि आज भी अनेक शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ता जैसे लोग चुपचाप लोकतंत्र की मशाल थामे हुए हैं। हमें संविधान प्रदत्त अधिकारों जैसे वोट देने का अधिकार, अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम का अधिकार आदि का जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग करना चाहिए और अपने कर्तव्यों को निभाने के साथ-साथ महापुरुषों के विचारों को स्वयं में व समुदाय में लागू करने का भरसक प्रयास करना चाहिए।
Author: संजय कुमार यादव
संवाददाता










