राजखाड़ अंबेडकर नगर: पुल और सड़क के अभाव में खाट पर ले जाकर नदी पार कराई गर्भवती महिला, प्रशासन पर सवाल

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

गढ़वा राजखाड़ अंबेडकर नगर में सोमवार की देर शाम घटी घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि सरकारी दावों और जमीनी सच्चाई में कितना बड़ा अंतर है। गाँव की गर्भवती महिला चम्पा कुमारी, पति सुजीत कुमार, जब प्रसव पीड़ा से कराह रही थी, तब धुरिया नदी का तेज बहाव उसकी सबसे बड़ी बाधा बन गया। पुल और सड़क के अभाव में गाँववालों ने मजबूरी में उसे खाट पर लिटाकर नदी पार कराया। ग्रामीणों ने कंधे तक पानी में उतरकर उसे सुरक्षित किनारे पहुँचाया। यह दृश्य दिल दहला देने वाला था और प्रशासन की संवेदनहीनता पर गहरी चोट करता है।

गाँववालों का कहना है कि आपातकालीन सेवा के लिए बिश्रामपुर स्वास्थ्य केंद्र से कई बार संपर्क किया गया, लेकिन केंद्र प्रभारी चिकित्सक ने एक घंटे तक फोन उठाना भी उचित नहीं समझा। यह लापरवाही मौत को दावत देने के बराबर थी। अंततः ग्रामीणों और परिजनों ने आपसी सहयोग से निजी गाड़ी बुलवाई और टूटी-फूटी सड़क व नदी पार कर महिला को अस्पताल पहुँचाया। डॉक्टरों ने रात में उसकी डिलीवरी कराई। सौभाग्य से जच्चा-बच्चा दोनों सुरक्षित हैं, पर स्वास्थ्य कर्मियों का कहना था कि यदि थोड़ी देर और हो जाती तो हालात बेहद गंभीर हो सकते थे।

इस घटना ने ग्रामीणों में आक्रोश और गुस्सा और गहरा कर दिया। बिश्रामपुर विधानसभा के पूर्व प्रत्याशी सुधीर कुमार चंद्रवंशी ने मौके की जानकारी मिलते ही कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि दलित बहुल राजखाड़ अंबेडकर नगर गाँव आज भी सड़क और पुल जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित है। वर्षों से सिर्फ़ आश्वासन मिलता आया है, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं हुआ। उन्होंने चेतावनी दी, “यदि पुल और सड़क निर्माण का काम शीघ्र शुरू नहीं किया गया तो जनता आंदोलन के रास्ते पर जा सकती है।”

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बिश्रामपुर स्वास्थ्य केंद्र की लापरवाही अब बर्दाश्त के बाहर है। ग्रामीणों ने खुलासा किया कि ममता वाहन सेवा के लिए उन्हें सहिया दीदी और डालटनगंज कॉल सेंटर की जुगलबंदी के कारण घंटों इंतजार करना पड़ता है और कई बार वाहन कर्मियों द्वारा मरीजों से जबरन पैसे भी वसूले जाते हैं। वहीं, जननी सुरक्षा योजना के तहत मिलने वाले 1400 रुपये का लाभ अधिकांश महिलाओं को अब तक नहीं मिला है। इस पर भी सुधीर चंद्रवंशी ने सरकार से तत्काल संज्ञान लेने और कार्यवाही करने की माँग की।

स्वास्थ्य केंद्र की हालत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहाँ केवल तीन जांचें—हीमोग्लोबिन, मलेरिया और प्रेग्नेंसी टेस्ट—ही हो पाती हैं। बाकी जरूरी जांचें उपलब्ध नहीं हैं। लैब भी महज सुबह 9 से दोपहर 3 बजे तक ही चलता है, जबकि नियम के अनुसार इसे तीनों शिफ्ट में चालू रहना चाहिए। यह स्थिति बताती है कि किस तरह स्वास्थ्य सेवाएँ लोगों के जीवन से खिलवाड़ कर रही हैं।

सुधीर चंद्रवंशी ने माँग रखी कि दोषी प्रभारी चिकित्सक और कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई हो। राजखाड़ अंबेडकर नगर में पुल और सड़क निर्माण तत्काल शुरू किया जाए। जननी सुरक्षा योजना का भुगतान सभी पात्र महिलाओं को शीघ्र मिले और ममता वाहन सेवा में व्याप्त अव्यवस्था व पैसों की उगाही पर रोक लगे। इसके साथ ही, बिश्रामपुर स्वास्थ्य केंद्र को तीनों शिफ्ट में संचालित कर सभी जांचें सुनिश्चित की जाएँ।

गौर करने वाली बात यह है कि यह समस्या पहली बार सामने नहीं आई है। पिछले माह भी इसी गाँव में एक मरीज को खाट पर नदी पार कर अस्पताल पहुँचाना पड़ा था। तब सुधीर चंद्रवंशी ने गाँव में बैठक कर जनप्रतिनिधियों से समाधान की अपील की थी। उस समय पलामू की उपायुक्त समीरा एस ने सक्रियता दिखाते हुए जेई को नापी के लिए भेजा था और ग्रामीणों ने उनकी तत्परता की प्रशंसा की थी। ग्रामीणों को आज भी उम्मीद है कि उपायुक्त की पहल से इस समस्या का स्थायी समाधान निकलेगा, अन्यथा आज़ादी के सात दशक बाद भी गाँव के लोग मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहेंगे।

इस दर्दनाक बचाव कार्य में गाँव के लोग पूरी ताकत और हिम्मत के साथ शामिल हुए। अकलू राम, अवधेश राम, सुनील राम, ब्रह्मदेव राम, राम कवल राम, रामकुमार राम, शंकर प्रताप राम, पप्पू कुमार, ऋषि कुमार, सहयोगी सुनीता देवी और दाई धनेश्वरी देवी ने मिलकर यह सुनिश्चित किया कि चम्पा कुमारी समय पर अस्पताल पहुँच सके। यह सामूहिक प्रयास इंसानियत और आपसी सहयोग का उदाहरण तो है, लेकिन साथ ही सरकार और प्रशासन की असफलता पर करारा तमाचा भी है।

झारखंड सरकार का स्वास्थ्य विभाग कई मामलों में उत्कृष्ट कार्य कर रहा है और हरसंभव सहयोग देने का प्रयास करता है। लेकिन चुनिंदा अधिकारियों के व्यक्तिगत स्वार्थ और लापरवाही के कारण पूरे बिश्रामपुर प्रखंड की छवि खराब हो रही है। जब तक ऐसे दोषियों पर सख्त कार्यवाही नहीं होगी, तब तक आमजन की पीड़ा बनी रहेगी।

राजखाड़ अंबेडकर नगर की यह घटना केवल एक प्रसूता महिला की पीड़ा नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की नाकामी और संवेदनहीनता का आईना है। अब सवाल यह है—कब तक गाँव की औरतें खाट पर बिठाकर नदी पार कर अस्पताल पहुँचाई जाती रहेंगी? और कब तक ग्रामीण अपने हक और जीवन की बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहेंगे?


 

संजय कुमार यादव
Author: संजय कुमार यादव

संवाददाता

और पढ़ें